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भारत के महान व्यक्तित्व-3 भगत सिंह

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Sat , Apr 12 2025

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दोस्तों आज हम अपनी भारत के महान व्यक्तित्व सीरीज का तीसरा आर्टिकल पब्लिश कर रहे हैं| पिछले दो आर्टिकल हमने सरदार वल्लभभाई पटेल एवं डॉ भीमराव अंबेडकर के लिए लिखे थे | 

आज हम तीसरा आर्टिकल भगत सिंह के लिए लिख रहे हैं | दोस्तों चलिए जानते हैं भगत सिंह के जीवन से हम क्या प्रेरणा ले सकते हैं और किस तरह एक महान देशभक्त ने अपना जीवन देश को समर्पित किया ?  चलिए जानते हैं उनके जीवन की एक झलक से-


भगतसिंह

भारत की आजादी के इतिहास को जिन अमर शहीदों के रक्त से लिखा गया है, जिन शूरवीरों के बलिदान ने भारतीय जन-मानस को सर्वाधिक उद्वेलित किया है, जिन्होंने अपनी रणनीति से साम्राज्यवादियों को लोहे के चने चबवाए हैं, जिन्होंने परतन्त्रता की बेड़ियों को छिन्न-मिन्न कर स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त किया है तथा जिन पर जन्मभूमि को गर्व है, उनमें से एक है भगतसिह |


भगतसिह का जन्म 27 सितम्बर, 1907 को पंजाब के जिला लायलपुर में बगा गाँव (अब यह पाकिस्तान में है) में हुआ था. भगतसिंह के पिता सरदार किशनसिंह एवं उनके दो चाचा अजीतसिंह तथा स्वर्णसिंह अंग्रेजों के खिलाफ होने के कारण जेल में बन्द थे |

यह एक विचित्र संयोग ही था कि जिस दिन भगतसिंह पैदा हुए उनके पिता एवं चाचा को जेल से रिहा किया गया इस शुभ घड़ी के अवसर पर भगतसिंह के घर में खुशी और भी बढ़ गई थी  |यही सब देखते हुए भगतसिंह की दादी ने  बच्चे का नाम भागा वाला (अच्छे भाग्य वाला) रखा बाद में उन्हें भगतसिंह कहा जाने लगा |एक देशभक्त के परिवार में जन्म लेने के कारण भगतसिंह को देशभक्ति और स्वतंत्रता का पाठ विरासत में पढ़ने को मिल गया था |

भगतसिंह जब चार-पाँच वर्ष के हुए तो उन्हें गाँव के प्राइमरी स्कूल में दाखिला दिलाया गया | वे अपने साथियों में इतने अधिक लोकप्रिय थे कि उनके मित्र उन्हें अनेक बार कन्धों पर बिठाकर घर तक छोड़ने आते थे | भगतसिंह को स्कूल के तंग कमरों में बैठना अच्छा नहीं लगता था | वे कक्षा छोड़कर खुले मैदानों में घूमने निकल जाते थे | वे खुले मैदानों की तरह ही आजाद होना चाहते |


प्राइमरी शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात् भगतसिह को 1916-17 में लाहौर के डीएवी स्कूल दाखिला दिलाया गया | वहाँ उनका सम्पर्क लाला लाजपतराय और सूफी अम्बा प्रसाद जैसे देश भक्तों से हुआ |

13 अप्रैल, 1919 में 'रोलेट एक्ट के विरोध में सम्पूर्ण भारत में प्रदर्शन हो रहे और इन्हीं दिनों जलियावाला बाग काण्ड हुआ. इस काण्ड का समाचार सुनकर भगत लाहौर से अमृतसर पहुँचे, देश पर मर मिटने वाले शहीदों के प्रति श्रद्धांजलि दी तथा रक्त से भीगी मिट्टी को उन्होंने एक बोतल में रख लिया, जिससे हमेशा यह याद रहे कि उन्हें अपने देश और देशवासि के अपमान का बदला लेना है।

1920 के महात्मा गांधी के असहयोग आन्दोलन से प्रभावित होकर 1921 में भगत   ने स्कूल छोड दिया असहयोग आन्दोलन से प्रभावित छात्रों के लिए लाला लाजपतराय ने लाहौर में नेशनल कॉलेज की स्थापना की थी, इसी कॉलेज में भगतसिंह ने भी प्रवेश लिया | पजाब नेशनल कॉलेज में उनकी देशभक्ति की भावना फूलने-फलने लगी इसी कॉलेज में ही यशपाल भगवतीचरण सुखदेव तीर्थराम झण्डासिंह आदि क्रान्तिकारियों से सम्पर्क हुआ | कॉलेज में एक नेशनल नाटक क्लब भी था |इसी क्लब के माध्यम से भगतसिंह ने देशभक्ति पूर्ण नाटकों में अभिनय भी किया ये नाटक थे- राणा प्रताप ,भारत दुर्दशा और सम्राट चन्द्रगुप्त |

सन् 1923 में जब उन्होंने एफ ए परीक्षा उत्तीर्ण की तब बड़े भाई जगतसिह की अकाल मृत्यु हो जाने के कारण उनके विवाह की चर्चाए चलने लगीं | घर के लोग वंश को चलाने के लिए उनका विवाह शीघ्र कर देना चाहते थे, परन्तु भगतसिह तो भारत माँ की बेड़ियों को काट देने के लिए उद्यत थे | विवाह उन्हें अपने मार्ग में बाधा लगी वे इस चक्कर से बचने के लिए कॉलेज से भाग गए और दिल्ली पहुँचकर दैनिक समाचार पत्र 'अर्जुन में संवाददाता के रूप में कार्य किया |

सन 1924 में उन्होंने कानपुर में दैनिक पत्र प्रताप के सचालक गणेश शंकर विद्यार्थी से भेंट की इस भेंट के माध्यम से वे बटुकेश्वर दत्त और चन्द्रशेखर आजाद के सम्पर्क में आए बटुकेश्वर दत्त से उन्होंने बंगला सीखी |

हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्य बने अब भगतसिह पूर्ण रूप से कान्तिकारी कार्यों तथा देश के सेवा कार्यों में संलग्न हो गए थे जिस समय भगतसिह का चन्द्रशेखर आजाद से सम्पर्क हुआ, तब मानो दो उलका पिंड ज्वालामुखी, देशभक्त आत्मबलिदानी एक हो गए हों. ऐसा प्रतीत होने लगा इन दोनों ने मिलकर न केवल अपने कान्तिकारी दल को मजबूत किया, बल्कि उन्होंने अंग्रेजों के दाँत  खट्टे करने में कोई कसर नहीं छोडी |


भगतसिंह ने लाहौर में 1926 में नौजवान भारत सभा का गठन किया |यह सभा धर्मनिरपेक्ष संस्था थी तथा इसके प्रत्येक सदस्य को सौगन्ध लेनी पड़ती थी कि वह देश के हितों को अपनी जाति तथा अपने धर्म क हितों से बढ़कर मानेगा |यह सभा हिन्दुओं मुसलमानों तथा अछूतों के छुआछूत जात-पात, खान-पान आदि सकीर्ण विचारों को मिटाने के लिए संयुक्त भोजों का आयोजन भी करती थी. परन्तु मई 1930 में इसे गैर-कानूनी घोषित कर दिया गया |


1927 के दिसम्बर महीने में काकोरी केस के सम्बन्ध में रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला राजेन्द्र लाहिड़ी और रोशनसिंह को फांसी दी गई चन्द्रशेखर आजाद अग्रेजों के जाल में नहीं फंसे | वे अब भी आजाद ही थे कान्तिकारी दल में अस्त-व्यस्तता उत्पन्न हो गई थी क्रान्तिकारी दल की अस्त-व्यस्तता चन्द्रशेखर को खटक रही थी अत: वे भगतसिंह से मिले | भगतसिंह और आजाद ने दल को पुन संगठित किया दल के लिए नए सिरे से अस्त्र-शस्त्र संग्रह किए ब्रिटिश सरकार अब भगतसिंह को किसी भी कीमत पर गिरफ्तार करने के लिए कटिबद्ध थी |

1927 में दशहरे वाले दिन एक चाल द्वारा भगतसिह को गिरफ्तार कर लिया गया उन पर झूठा मुकदमा चलाया गया, परन्तु वे भगतसिह पर आरोप साबित नहीं कर पाए उन्हें भगतसिंह को छोड़ना पड़ा 8 और 9 सितम्बर, 1928 को कान्तिकारियों की एक बैठक दिल्ली के फिरोजशाह के खण्डरों में हुई भगतसिंह के परामर्श पर हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का नाम बदलकर 'हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन रखा गया |

सन् 1919 से लागू शासन सुधार अधिनियमों की जाँच के लिए फरवरी 1928 में साइमन कमीशन बम्बई पहुँचा जगह-जगह साइमन कमीशन के विरुद्ध विरोध प्रकट किया गया 30 अक्टूबर 1928 को कमीशन लाहौर पहुंचा लाला लाजपतराय के नेतृत्व में एक जुलूस कमीशन के विरोध में शान्तिपूर्ण प्रदर्शन कर रहा था भीड बढ़ती जा रही थी इतने व्यापक विरोध को देखकर सहायक अधीक्षक साण्डर्स जैसे पागल हो गया था उसने लाठी चार्ज करवा दिया लाला लाजपतराय पर लाठी के अनेक वार किए गए वे खून से लहुलुहान हो गए भगतसिह यह सब कुछ अपनी आँखों से देख रहे थे |17 नवम्बर 1928 को लालाजी का देहान्त हो गया | भगतसिंह का खून खौल उठा वे बदला लेने के लिए तत्पर हो गए |


लाला लाजपतराय की हत्या का बदला लेने के लिए हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन ने भगतसिह राजगुरु सुखदेव आजाद और जयगोपाल को यह कार्य सौंपा इन कान्तिकारियों ने साण्डर्स को मारकर लालाजी की मौत का बदला लिया | साण्डर्स की हत्या ने भगतसिंह को पूरे देश का एक प्रिय नेता बना दिया. इस अवसर पर जवाहरलाल नेहरू ने अपनी आत्मकथा में यह वर्णन किया है-


भगतसिंह एक प्रतीक बन गया साण्डर्स के कत्ल का कार्य तो भुला दिया लेकिन चिन्ह शेष बना रहा और कुछ ही माह में पंजाब का प्रत्येक गाँव और नगर तथा बहुत कुछ उत्तरी भारत उसक नाम से गूंज उठा उसके बारे में बहुत से गीतों की रचना हुई और इस प्रकार उसे जो लोकप्रियत प्राप्त हुई वह आश्चर्यचकित कर देने वाली थी।


अग्रेज सरकार से बचने के लिए भगतसिंह अपने केश और दाढ़ी कटवाकर पैंट पहन का और सिर पर हैट लगाकर तथा वेश बदलकर अग्रेजों की आखों में धूल झोकते हुए कलकत्ता पहुँचे कलकत्ता में कुछ दिन रहने के उपरान्त वे आगरा गए |


हिन्दुस्तान समाजवादी गणतन्त्र संघ की केन्द्रीय कार्यकारिणी की एक सभा हुई, जिसमे पब्लिक सेफ्टी बिल तथा डिस्प्यूट्स बिल पर चर्चा हुई, इनका विरोध करने के लिए भगतसिंह ने केन्द्रीय असेम्बली में बम फेंकने का प्रस्ताव रखा साथ ही यह भी कहा कि बम फेंकते समय इस बात का ध्यान रखा जाए कि किसी व्यक्ति के जीवन को कोई हानि न हो |

इसके बाद क्रान्तिकारी स्ट्य को गिरफ्तार करा दें इस कार्य को करने के लिए भगतसिंह अड गए कि वह स्वयं यह कार्य करेंगे आजाद इसके विरुद्ध थे, परन्तु विवश होकर आजाद को भगतसिंह का निर्णय स्वीकार करना पड़ा, भगतसिंह के सहायक बने-बटुकेश्वर दत्त |


8 अप्रैल 1929 को दोनों निश्चित समय पर असेम्बली में पहुँचे जैसे ही बिल के पक्ष में निर्णय देने के लिए असेम्बली का अध्यक्ष उठा भगतसिंह ने एक बम फेंका फिर दूसरा दोनों ने नारा लगाया इन्कलाब जिन्दाबाद -साम्राज्यवाद का नाश हो इसी के साथ अनेक पर्चे भी फेंके जिनमें अंग्रेजी साम्राज्यवाद के प्रति आम जनता का रोष प्रकट किया गया था | बम फेंकने के उपरान्त इन्होंने अपने आपको गिरफ्तार कराया इनकी गिरफ्तारी के उपरान्त अनेक क्रान्तिकारियों को पकड़ लिया गया जिनमें सुखदेव, जयगोपाल तथा किशोरीलाल शामिल थे |


भगतसिंह को यह अच्छी तरह मालूम था कि अब अंग्रेज उनके साथ कैसा सलूक करेंगे? उन्होंने अपने लिए वकील भी नहीं रखा, बल्कि अपनी आवाज जनता तक पहुंचाने के लिए अपने मुकदमे की पैरवी उन्होंने खुद करने की ठानी 7 मई, 1929 को भगतसिंह तथा बटुकेश्वर दत्त के विरुद्ध न्याय का नाटक शुरू हुआ भगतसिंह ने 6 जून के दिन अपने पक्ष में वक्तव्य दिया जिसमें भगतसिंह ने स्वतन्त्रता, साम्राज्यवाद क्रान्ति आदि पर विचार प्रकट किए तथा सर्वप्रथम क्रान्तिकारियों के विचार सारी दुनिया के सामने रखे |


12 जून. 1929 को सेशन जज ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा 307 तथा विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 3 के अन्तर्गत आजीवन कारावास की सजा दी ये दोनों देशभक्त अपनी बात को और अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाना चाहते थे इसलिए इन्होंने सेशन जज के निर्णय के विरुद्ध लाहौर हाइकोर्ट में अपील की यहाँ भगतसिंह ने पुन अपना भाषण दिया 13 जनवरी 1930 को हाईकोर्ट ने सेशन जज के निर्णय को मान्य ठहराया | 

अब अग्रेज शासकों ने नए तरीके द्वारा भगतसिह तथा बटुकेश्वर दत्त को फसाने का निश्च किया इनके मुकदमे को टिब्यूनल के हवाले कर दिया |

5 मई 1930 को पूछ हाउस लाहौर में मुकदमे की सुनवाई शुरू की गई इसी बीच आजाद ने भगतसिह को जेल से छुड़ाने की योजना मी बनाई परन्तु 28 मई को भगवतीचरण बोहरा, जो बम का परीक्षण कर रहे थे घायल हो गए तथा उनकी मृत्यु हो जाने के बाद योजना सफल नहीं हो सकी |

अदालत की कार्यवाही लगभग तीन महीने तक चलती रही 26 अगस्त 1930 को अदालत का कार्य लगभग पूरा हो गया था अदालत ने भगतसिह को भारतीय दंड संहिता की धारा 129.302 तथा विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 4 तथा 6 एफ तथा भारतीय दण्ड संहिता की धारा 120 के अन्तर्गत अपराधी सिद्ध किया तथा 7 अक्टूबर 1930 को 68 पृष्ठीय निर्णय दिया जिसमें भगतसिंह, सुखदेव तथा राजगुरु को फासी की सजा दी गई लाहौर में धारा 144 लगा दी गई इस निर्णय के विरुद्ध नवम्बर 1930 में प्रिवी परिषद में अपील दायर की गई परन्तु यह अपील 10 जनवरी 1931 को रदद कर दी गई |

प्रिवी परिषद् में अपील रद्द किए जाने पर न केवल भारत में ही. बल्कि विदेशों से भी लोगों ने इसके विरुद्ध आवाज उठाई विभिन्न समाचार पत्रों में भगतसिंह और राजगुरु एवं सुखदेव की फाँसी की सजा के विरुद्ध अपनी पुरजोर आवाज बुलन्द की हस्ताक्षर अभियान चलाए गए यहाँ तक कि इंगलैण्ड की संसद के निचले सदन के इन के कुछ सदस्यों ने भी इस सजा का विरोध किया गांधी और इर्विन समझौते के समय प्रत्येक भारतवासी, कांग्रेसी गैर-काग्रेसी सबकी नजर उनकी और लगी हुई थी. परन्तु तत्कालीन परिस्थिति यही दर्शाती है कि गांधीजी ने इस और कोई विशेष कोशिश नहीं की गाधीजी के इस व्यवहार के प्रति आजाद हिन्द फौज के जनरल मोहन सिंह ने लिखा-


की वह (गांधीजी) भगतसिंह को फाँसी चढ़ने से बचा सकते थे यदि उन्होंने इस राष्ट्रीय वीर रिहाई को एक राष्ट्रीय प्रश्न बना लिया होता तो पूरा राष्ट्र कुर्बानी के लिए तैयार था |


पिस्तौल और पुस्तक भगतसिंह के दो परम विश्वसनीय मित्र थे जेल के बन्दी जीवन में जब पिस्तौल छीन ली जाती थी. तब पुस्तकें पढ़कर ही वे अपने समय का सदुपयोग करते थे जेल की काल कोठरी में रहते हुए उन्होंने कुछ पुस्तकें भी लिखी थीं-आत्मकथा दि डोर टू डेथ (मौत की दरवाजे पर), आइडियल ऑफ सोशलिज्म (समाज का आदर्श), स्वाधीनता की लड़ाई में पंजाब का पहला उभार | जेल में पुस्तकें पढ़ते-पढ़ते वे मस्ती में झूम उठते और शहीद राम प्रसाद बिस्मिल की यह पक्तियाँ गाने लगते-


मेरा रंग दे बसन्ती चोला-

इसी रंग में रंग के शिवा ने माँ का बन्धन खोला॥

मेरा रंग दे बसन्ती चोला-

यही रंग हल्दीघाटी में खुलकर था खेला।

नव बसन्त में भारत के हित वीरों का यह मेला।

मेरा रंग दे बसन्ती चोला।


फाँसी का समय प्रात काल 24 मार्च, 1931 निर्धारित हुआ था. पर सरकार ने भय के मारे 23 मार्च को सायंकाल 7.33 बजे, उन्हें कानून के विरुद्ध एक दिन पहले, प्रात काल की जगह संध्या समय तीनों देश भक्त क्रान्तिकारियों को एक साथ फाँसी देने का निश्चय किया जेल अधीक्षक जब फाँसी लगाने के लिए भगतसिंह को लेने उनकी कोठरी में पहुँचा तो उसने कहा सरदार जी- फाँसी का वक्त  हो गया है, आप तैयार हो जाइए उस समय भगतसिंह लेनिन के जीवन चरित्र को पढ़ने में तल्लीन थे उन्होंने कहा-" ठहरो। एक क्रान्तिकारी दूसरे कान्तिकारी से मिल रहा है "और फिर वे जेल अधीक्षक के साथ चल दिए, सुखदेव और राजगुरु को भी फाँसी स्थल पर लाया गया भगतसिंह ने अपनी दाई भुजा राजगुरु की बाई भुजा में डाल ली और बाई भुजा सुखदेव की दाई भुजा में क्षण भर तीनों रुके और तब वे यह गुनगुनाते हुए फाँसी पर झूल गए-


दिल से निकलेगी न मर कर भी वतन की उलफत,

मेरी मिट्टी से भी खुशबू ए-वतन आएगी |


परन्तु ब्रिटिश सरकार के इन देशभक्तों पर किए जाने वाले अत्याचार का अभी खात्मा नहीं हुआ था उन्होंने इन शहीदों के मृत शरीर को एक बार फिर अपमानित करना चाहा |

उन्होंने उनके शरीर को टुकड़ों में विभाजित किया, उनमें अभी भी जेल के मुख्य द्वार से बाहर लाने की हिम्मत नहीं थी | वे शरीर के उन हिस्सों को बोरियों में भरकर रातों-रात चुपचाप फिरोजपुर के पास सतलज के  किनारे जा पहुँचे | मिट्टी का तेल छिड़ककर आग लगा दी गई, परन्तु यह आग आँधी की तरह फिरोजपुर से लाहौर शीघ्र पहुँच गई |

अंग्रेजी फौजियों ने जब देखा कि हजारों लोग मशालें लिए उनकी और आ रहे हैं तो वे वहाँ से भाग गए, तब देशभक्तों ने उनके शरीर का विधिवत् दाह संस्कार किया |


भगतसिंह तथा उनके साथियों की शहादत की खबर से सारा देश शोक के सागर में डूब चुका था बम्बई, मदास तथा कलकत्ता जैसे महानगरों का माहौल चिन्तनीय हो उठा भारत के ही नहीं विदेशी अखबारों ने भी अंग्रेज सरकार के इस कृत्य की बहुत आलोचनाएं की अंग्रेज शासको के दिमागों पर भगतसिंह का खौफ इतना छाया हुआ था कि वे उनके चित्रों को भी जब्त करने लगे थे भगतसिंह की शौहरत से प्रभावित होकर डॉ प‌ट्टाभिसीतारमैया ने लिखा है- यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि भगतसिंह का नाम भारत में उतना ही लोकप्रिय था, जितना कि गांधीजी का"


भगतसिह तथा उनके साथियों को फाँसी दिए जाने पर लाहौर के उर्दू दैनिक समाचार-पत्र पयाम ने लिखा था-


हिन्दुस्तान इन तीनों शहीदों को पूरे ब्रितानिया से ऊँचा समझता है अगर हम हजारों-लाखों अंग्रेजों को मार भी गिराए, तो भी हम पूरा बदला नहीं चुका सकते यह बदला तभी पूरा होगा, जब तुम हिन्दुस्तान को आजाद करा लो, तभी ब्रितानिया की शान मिट्टी में मिलेगी ओ। भगतसिह राजगुरु और सुखदेव, अंग्रेज खुश हैं कि उन्होंने तुम्हारा खून कर दिया, लेकिन वो गलती पर हैं उन्होंने तुम्हारा खून नहीं किया, उन्होंने अपने ही भविष्य में छुरा घोंपा है तुम जिन्दा हो और हमेशा जिन्दा रहोगे |


दोस्तों उम्मीद करते हैं आपको महान देशभक्त भगत सिंह के जीवन से जुड़ा हुआ यह आर्टिकल पसंद आया होगा |अपनी पसंद और अपनी प्रतिक्रिया हमें कमेंट्स और लाइक के माध्यम से अवश्य दें | दोस्तों अगर आप इसी तरीके के हमारे पुराने आर्टिकल जो कि हमने डॉ भीमराव अंबेडकर और सरदार वल्लभभाई पटेल के जीवन पर लिखे हैं उनको पढ़ने में रुचि रखते हैं तो कृपया इन लिक के माध्यम से उन्हें पढ़ सकते हैं | धन्यवादआपका दिन शुभ हो |

 भारत के महान व्यक्तित्व -डॉक्टर भीमराव अंबेडकर 

भारत के महान व्यक्तित्व - सरदार वल्लभभाई पटेल 

भगत सिंह के जीवन और योगदान पर आधारित 10 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ) निम्नलिखित हैं:

1. भगत सिंह का जन्म कब और कहाँ हुआ था?  

   भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को पंजाब प्रांत के लायलपुर जिले के बंगा गाँव में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है.


2. भगत सिंह ने किस संगठन की स्थापना की थी?  

   उन्होंने 'नौजवान भारत सभा' और 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन' की स्थापना की थी.


3. जलियाँवाला बाग हत्याकांड का भगत सिंह पर क्या प्रभाव पड़ा?

   इस घटना ने भगत सिंह को गहराई से प्रभावित किया और उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ क्रांति का संकल्प लिया.


4. भगत सिंह ने किस अंग्रेज अधिकारी की हत्या की थी?  

   उन्होंने राजगुरु के साथ मिलकर 17 दिसंबर 1928 को लाहौर में सहायक पुलिस अधीक्षक जे.पी. सांडर्स की हत्या की थी.


5. भगत सिंह ने केंद्रीय असेंबली में बम क्यों फेंका था?  

   उन्होंने 8 अप्रैल 1929 को असेंबली में बम फेंककर ब्रिटिश सरकार को जगाने का प्रयास किया था। यह बम ऐसी जगह फेंका गया था जहाँ कोई मौजूद नहीं था.


6. भगत सिंह ने जेल में कौन सा लेख लिखा था?

   उन्होंने जेल में "मैं नास्तिक क्यों हूँ" नामक लेख लिखा था.


7. भगत सिंह को फाँसी कब दी गई थी?

   उन्हें 23 मार्च 1931 को सुखदेव और राजगुरु के साथ फाँसी दी गई थी.


8. भगत सिंह ने भूख हड़ताल कितने दिनों तक की थी?  

   उन्होंने जेल में 64 दिनों तक भूख हड़ताल की थी.


9. भगत सिंह के अंतिम शब्द क्या थे?  

   उनके अंतिम शब्द थे "इंकलाब जिंदाबाद" और "साम्राज्यवाद मुर्दाबाद".


10. भगत सिंह का भारत की स्वतंत्रता संग्राम में क्या योगदान था?  

    उन्होंने अपने विचारों और क्रांतिकारी गतिविधियों से स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा दी और युवाओं को प्रेरित किया.


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